जिन्नाह की तस्वीर के अलावा और क्या-क्या सम्भाले हुए है एएमयू ?

फैसल महमूद

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों पर देशद्रोह तथा दंगाई होने के इस प्रकार आरोप लग रहे हैं कि वहां पर पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह की फ़ोटो लगी हुई है. सत्ताधारी दल के नेता तथा उनके अंध-समर्थकों की मांग है कि जिन्नाह का वह फ़ोटो वहां से हटाया जाए. इसके जवाब में विश्विद्यालय की ओर से जिस किसी का भी बयान अब तक आया है उनका सार लगभग एक ही है:

ना तो हमें जिन्नाह से कोई लगाव है और ना जिन्नाह को यहां रोल मॉडल बना कर दिखाया जाता है, बल्कि यह 1938 में छात्रसंघ में स्थापित की गई फ़ोटो है जब जिन्नाह को छात्रसंघ की आजीवन सदस्यता दी गयी थी. आजीवन सदस्यता वाली ये लिस्ट महात्मा गांधी से शुरू होती है. इसके अलावा उसी हॉल में, जहां ये फोटो स्थापित है, गांधी जी, इक़बाल, अम्बेडकर, अबुल कलाम तथा नेहरू के साथ साथ अन्य कई प्रतिष्ठित हस्तियों की फ़ोटो स्थापित हैं. इन सभी फ़ोटो को इस लिए संजो कर रखा गया है क्योंकि ये की हमारे इतिहास का हिस्सा हैं, हमारा अतीत हैं, अच्छा हैं या बुरा हैं, यह दूसरी बहस है.

यहां पर एक उदाहरण यह है कि बीते दिनों माननीय राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जब विश्विद्यालय पहुंचे और कार्यक्रम के दौरान उन्हें पहनाए गए गाउन के बारे में बताया गया उन्होंने आश्चर्य से कहा कि:

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में आना मेरे लिए बड़ी खुशी की बात है. लेकिन उससे ज्यादा खुशी तब हुई जब उन्हें पता चला कि जो गाउन उन्होंने पहन रखा है, वह गाउन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉक्टर फखरुद्दीन अली, डॉ. राधाकृष्ण, डॉ. जाकिर हुसैन और ज्ञानी जैल सिंह ने पहना था। यह गाउन साठ साल से यूनिवर्सिटी ने संभाल रखा है जो उनकी रवायत और परंपरा को दर्शाता है.

इसी भाषण में उन्होंने विश्विद्यालय को किसी समुदाय से ना जोड़ने की बात कही. परंतु इसके उलट, भाजपा व अन्य दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े नेताओं ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को हमेशा से एक मुस्लिम कट्टरपंथी संस्थान बताकर माहौल को सांप्रदायिक करने का काम किया है. जबकि इसके विपरीत, अलीगढ़ विश्वविद्यालय धार्मिक सद्भावना के साथ धर्मनिरपेक्षता तथा आपसी भाईचारे का गढ़ रहा है. हर समय मे यहां विविधताओं का जमावड़ा रहा है, फिर चाहे वो धर्म के आधार पर देखी जाएं या विचारधाराओं के आधार पर.

ये चीज़ें भी अलीगढ़ के इतिहास में गुथी हुई हैं कि जहां एक ओर नवाब मोहसिनुल मुल्क जैसे मुसलमान इसके भूमिगत विस्तार के लिए आगे बढ़ कर आये वहीं दूसरी ओर राजा महेंद्र प्रताप उनसे पीछे कहाँ रहे. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हर दौर में ध्यानचंद, रामप्रकाश सेठी, लाला अमरनाथ, ईश्वरी प्रसाद जैसे लोग रहे हैं. लेकिन सत्ता के भूखों द्वारा उनके राजनीतिक गलियारों को रौशन रखने के लिए एएमयू को बदनाम करने का कोई न कोई शगूफा आगे कर दिया जाता है.

जिन्नाह को लेकर अलीगढ़ के सांसद द्वारा आपत्ति जताना उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है, जिसका समाधान विचारों के आदान-प्रदान, वाद-विवाद से संभव हो सकता था. लेकिन जिस प्रकार से पूरे मामले को राष्ट्रवाद और धर्म के सांचे में ढालने के बाद अपने समर्थन में एक कट्टरपंथी दल को उकसाकर संविधान की अवहेलना की गई है, वह अलोकतांत्रिक है.
दूसरी तरफ मीडिया सत्ता की चाटुकारिता में इस मामले को गलत तरीके से रिपोर्ट कर रही है. झूठ फैला रही है.मामले को और संगीन बना रही है.

जनता को इन सब चीजों को देखने के उपरांत किसी का पक्ष लिए बिना जानकारी जुटानी चाहिए. तब किसी पक्ष पर विश्वास करे. जैसा कि ऊपर बताया गया है कि जिन्नाह के फोटो के साथ अन्य कई हस्तियों के फोटो भी यूनियन हॉल में स्थापित हैं. इसके अलावा और बहुत सी प्राचीन धरोहर हैं जो ये विश्विद्यालय समेटे हुए है. इनके बारे में जानना उन लोगों के लिए मुख्यतः महत्वपूर्ण है जो इस पूरे प्रकरण को धर्म तथा देशद्रोह के चश्मे से देख रहे हैं. एक बड़ी ऐतिहासिक धरोहर समेटे हुए इस विश्वविद्यालय में प्रत्येक की बात ना करते हुए सिर्फ कुछ का जिक्र यहां किया जाना उचित होगा.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की 1877 मेंं स्थापित मौलाना आजाद लाइब्रेरी, जो एशिया की बड़ी लाइब्रेरीज़ में शुमार होती है, में 13.50 लाख पुस्तकों के साथ तमाम दुर्लभ पांडुलिपियां भी मौजूद हैं. इसमे अकबर के दरबारी फ़ैज़ी द्वारा फ़ारसी में अनुदित गीता तथा 400 साल पुरानी फ़ारसी में अनुदित महाभारत की पांडुलिपि संरक्षित है. तमिल भाषा में लिखे भोजपत्र भी इसमे रखे गए हैं. इसी पुस्तकालय के गैलरी में कई महत्वपूर्ण शख्सियत की तस्वीरें लगी हैं जिनमे गांधी, नेहरू, अम्बेडकर, तथा राजा महेन्द्रप्रताप की फ़ोटो भी विवरण के साथ उपस्थित हैं.

लाइब्रेरी के अलावा एएमयू के मूसा दकरी संग्रहालय में अनेक ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण वस्तुएँ तो हैं ही, सर सैयद अहमद का 27 देव प्रतिभाओं का वह कलेक्शन भी है जिसे उन्होंने अलग-अलग स्थानों का भ्रमण कर जुटाया था. इसके अलावा यहां पर जैन तीर्थंकर भगवान महावीर का स्तूप और स्तूप के चारों ओर आदिनाथ की 23 प्रतिमाएं हैं. सुनहरे पत्थर से बने पिलर में कंकरीट की सात देव प्रतिमाएं भी यहां स्थापित हैं. शेष शैया पर लेटे भगवान विष्णु तथा कंकरीट के सूर्यदेव इस संग्रहालय का सौंदर्य हैं. इसके अलावा महाभारत काल की भी कई दुर्लभ वस्तुएं यहां मौजूद हैं. ये पवित्र धरोहरें पूरे सम्मान के साथ यहां पर मौजूद हैं जो यहां की विविधता का प्रमाण हैं.

इन सब दुर्लभ तथा धार्मिक विविधताओं भरे कलेक्शन को रखे जाने वाले लोगों का इतिहास से लगाव का अंदाज़ा लगाया जा सकता है और ऊपर लिखे गए उनके कथनों में सत्यता का अभास स्वतः हो जाता है. और जो लोग भी इस मामले में जनता को भड़का रहे हैं वो इस देश की अखंडता तथा लोकतंत्र पर खतरा हैं, फिर वो अलीगढ़ के सांसद तथा इस मामले में उनका समर्थन करने वाले अन्य राजनेता हों या उनकी दलाली में तत्पर मीडिया.

लेखक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मानवाधिकार में शोध कर रहे हैं. यह लेखक के निजी विचार हैं. यह लेख सर्व-प्रथम जनपत्र पर प्रकाशित हुआ था.

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