[एएमयू] हम टुच्चे हो गए हैं : अशोक वाजपेयी

मुहम्मद नवेद अशरफ़ी | 07 मार्च, 2017 हाल ही में संपन्न हुए तीन दिवसीय अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय (अमुवि) साहित्य महोत्सव (एएमयू लिटरेरी फ़ेस्टिवल) २०१७

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इक़बाल, टैगोर, गाँधी, ब्रेक्सिट और बॉलीवुड पर चर्चा के साथ ‘अमुवि साहित्योत्सव २०१७’ का समापन

अलीगढ़ | ०५ मार्च २०१७ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी डिबेटिंग एंड लिटरेरी क्लब (यूडीएलसी) द्वारा कल्चरल एजुकेशन सेंटर (सीईसी) परिसर में आयोजित तीन

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निगाह-ए-नाज़ ने पर्दे उठाए हैं क्या क्या | फ़िराक़ गोरखपुरी

निगाह-ए-नाज़ ने पर्दे उठाए हैं क्या क्या हिजाब अहल-ए-मोहब्बत को आए हैं क्या क्या जहाँ में थी बस इक अफ़्वाह तेरे जल्वों की चराग़-ए-दैर-ओ-हरम

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ये मातम-ए-वक़्त की घड़ी है | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ठहर गई आसमाँ की नदिया वो जा लगी है उफ़क़ किनारे उदास रंगों की चाँद नय्या उतर गए साहिल-ए-ज़मीं पर सभी खवय्या तमाम तारे

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[कविता] [वीडियो] समर शेष है…. (रामधारी सिंह दिनकर)

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो किसने कहा, युद्ध की बेला गई, शान्ति से बोलो? किसने कहा, और मत बेधो हृदय

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ग़ुस्लख़ाना | सआदत हसन मन्टो (Bathroom | Sadat Hasan Manto)

सदर दरवाज़े के अंदर दाख़िल होते ही सीढ़ियों के पास एक छोटी सी कोठरी है जिस में कभी उपले और लकड़ियां-कोयले रखे जाते थे।

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