ये मातम-ए-वक़्त की घड़ी है | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ठहर गई आसमाँ की नदिया वो जा लगी है उफ़क़ किनारे उदास रंगों की चाँद नय्या उतर गए साहिल-ए-ज़मीं पर सभी खवय्या तमाम तारे

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[कविता] [वीडियो] समर शेष है…. (रामधारी सिंह दिनकर)

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो किसने कहा, युद्ध की बेला गई, शान्ति से बोलो? किसने कहा, और मत बेधो हृदय

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ग़ुस्लख़ाना | सआदत हसन मन्टो (Bathroom | Sadat Hasan Manto)

सदर दरवाज़े के अंदर दाख़िल होते ही सीढ़ियों के पास एक छोटी सी कोठरी है जिस में कभी उपले और लकड़ियां-कोयले रखे जाते थे।

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