विचारों से असहमति और सामाजिक सृजन | सलाहुद्दीन बख्शी

विचारक एरिक होफर (Eric Hoffer) के अनुसार:

किसी भी विचार का आरम्भ उसकी असहमति में होता है, न सिर्फ दूसरों से बल्कि अपने आप से भी.

विचारधारा की शुरुआत एक बुरी समझी जाने वाली वस्तु से हुई थी. विचारधारा विचारों का एक समुच्चय (Set of Ideas) होती है जो संसार को अपने इन्हीं विचाररूपी चश्मे से देखने का प्रयत्न करती है. फिर जन्म होता है दूसरी विचारधाराओं का जो पहली से असहमति का परिणाम होती हैं. संसार का हर मनुष्य किसी ना किसी विचारधारा में विश्वास रखता है और किसी भी विचारधारा को न मानना भी एक प्रकार की विचारधारा है. इस दुनिया में बहुत सी विचारधाराएँ हैं, सभी धर्म भी अपने आप में विचारधाराएँ कहे जा सकते हैं.


महान स्वतंत्रता विचारक जॉन स्टुअर्ट मिल (John Stuart Mill) ने तो पूरी मानवता के खिलाफ एक व्यक्ति को भी बोलने की आज़ादी दी थी. तो फिर समस्या कहाँ उत्पन्न होती है? समस्या तब होती है जब लोग असहमति में जलन और नफरत जोड़ देते हैं. यदि विचार से असहमती न हो तो इससे दो ही निष्कर्ष निकलते हैं: या तो हम विकास की अंतिम अवस्था को पहुँच चुके हैं या सम्पूर्ण समाज जड़ बुद्धि (Idiot) हो गया है.


अब प्रश्न यह उठता है कि असहमत होना कैसा है? यह अच्छी मनोदशा है, बल्कि असहमति या असहमत होना सभ्यता और शिक्षित समाज की निशानी है. जर्मन विचारक हेगल (Hegel) ने कहा कि विकास की अंतिम अवस्था (Final stage of Development) तक पहुँचने के लिये अंतर्विरोधों (Contradictions) का होना बहुत आवश्यक है, उन्होंने इसको सृष्टि की रचना का आधार भी माना है.

सर्वविदित है की लोगों के एक समूह में सभी का सहमत या असहमत होना एक अनुकूल सी बात नहीं लगती. महान स्वतंत्रता विचारक जॉन स्टुअर्ट मिल (John Stuart Mill) ने तो पूरी मानवता के खिलाफ एक व्यक्ति को भी बोलने की आज़ादी दी थी. तो फिर समस्या कहाँ उत्पन्न होती है? समस्या तब होती है जब लोग असहमति में जलन और नफरत जोड़ देते हैं. यह गलत है. विभिन्न विचारधाराएँ अपने मार्ग के सही होने का दावा करती हैं, जो मानवता के कल्याण की तरफ जाता है. परन्तु जीवन के आधारभूत मूल्य सभी देश और काल में समान होते हैं.

टकराव लक्ष्य का ना होकर पंथ और पथ का है. विचारों से नफरत तब अच्छी लगती है जब वो मानवता और समाज के मूल्यों के विरोधी हों. विभिन्न मतों को मानने वाले अभी अपने गंतव्य पर पहुँचने से पहले परिणाम न निकाले. विभिन्न मार्गों से भी एक ही उद्देश्य पाया जा सकता है. इसको प्रमाणित करता है “समय” जिससे परे कोई नहीं. विभिन्नता और विविधता इस ब्रह्मांड के शाश्वत नियम हैं फिर चाहे वो विचारों में ही क्यूँ न हो. बुद्धिजीवियों ने अपने अपने समय में अमूल्य विचार दिए और उनसे ना सिर्फ दूसरे बल्कि वो स्वयं भी असहमत हुए और फिर उनको बदला भी.

किसी मत को गलत मानना व्यक्ति में बुद्धि और अन्वेषण का परिचायक है और गलत के साथ असहिष्णु होना अशिक्षा और असभ्यता का. असहमति और अंतर्विरोध इस जीवन का चक्र हैं. जिस प्रकार असत्य के अभाव में सत्य का बोध कठिन है, उसी प्रकार विरोधी विचार के अभाव में हमारी प्रगति. यदि किसी विचार से असहमति न हो तो इससे दो निष्कर्ष निकलते हैं या तो हम विकास की अंतिम अवस्था को पहुँच चुके हैं या सम्पूर्ण समाज जड़ बुद्धि (Idiot) हो गया है.

जहाँ तक मानव सभ्यता के उद्भव और विकास का सवाल है, पहली स्थिति तो असंभव है. अब जो बचता है वो यह कि मौजूदा विचार से असहमति का अभाव, सवाल न करने की प्रवृति मानव-मस्तिष्क की जड़ता को स्थापित करता है.

Published on

08/11/2016 18:09

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